गुरूघासीदासजी की शिक्षायें : Shri Vishnu Banjare Satnami

गुरू घासीदास बाबाजी ने समाज में व्याप्त जातिगत विषमताओं को नकारा। उन्होंने ब्राम्हणों के प्रभुत्व को नकारा, और कई वर्णों में बांटने वाली जाति व्यवस्था का विरोध किया। उनका मानना था कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक रूप से समान हैसियत रखता है। गुरू घासीदास ने मूर्तियों की पूजा को वर्जित किया। वे मानते थे कि उच्च वर्ण के लोगों और मूर्ति पूजा में गहरा सम्बन्ध है।
गुरू घासीदास पशुओं से भी प्रेम करने की सीख देते थे। वे उन पर क्रूरता पूर्वक व्यवहार करने के खिलाफ थे। सतनाम पंथ के अनुसार खेती के लिए गायों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिये। गुरू घासीदास के संदेशों का समाज के पिछड़े समुदाय में गहरा असर पड़ा। सन् 1901 की जनगणना के अनुसार उस वक्त लगभग 4 लाख लोग सतनाम पंथ से जुड़ चुके थे और गुरू घासीदास के अनुयायी थे। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह पर भी गुरू घासीदास के सिध्दांतों का गहरा प्रभाव था। गुरू घासीदास के संदेशों और उनकी जीवनी का प्रसार पंथी गीत व नृत्यों के जरिए भी व्यापक रूप से हुआ। यह छत्तीसगढ़ की प्रख्यात लोक विधा भी मानी जाती है।
सत्गुरू घासीदास जी की सात शिक्षाएँ हैं-
(१) सतनाम् पर विश्वास रखना ।
(२) जीव हत्या नही करना ।
(३) मांसाहार नही करना ।
(४) चोरी, जुआ से दुर रहना ।
(५) नशा सेवन नही करना ।
(६) जाति-पाति के प्रपंच में नही पड़ना ।
(७) ब्यभिचार नही करना ।
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1. सत्य एवं अहिंसा
2. धैर्य
3. लगन
4. करूणा
5. कर्म
6. सरलता
7. व्यवहार

लेखक-श्री विष्णु बन्जारे सतनामी

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