सतनाम धर्म और राजागुरू बालकदास : Shri Vishnu Banjare Satnami


गुरू जी समाज को एकता के सूत्र में बांधने के लिये गाँव-गाँव में भंडारी, छड़ीदार, जैसे सम्मानित पदो का चुनाव किये ताकि प्रत्येक गाँव में सतनाम धर्म के रिजी रिवाजो के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान जैसे शादी-ब्याह, मरणी-दशगात्र जैसे समाजिक क्रिया क्रम सुगमता से किया जा सके । साथ ही महंत, राजमहंत जैसे सर्वोच्च सम्मानीय पदो का भी चुनाव योग्यता और समाजिक अनुभव को आधार मानते हुये किये इससे यह हुआ कि पुरा समाज गुरू से जुड़े रहे ।
दुसरी तरफ गुरू जी के बड़े भाई अध्यात्म गुरू के नाम से जाने-जाने वाले गुरू अमर दास जी ने सतज्ञान और सतमहिमा को आधार मानते हुये लोगो को सतनाम से जोड़ने का अनुकरणीय कार्य किये । जैतखाम, चौका पूजा, गुरू गद्दी, पंथी आदि के माध्यम से साथ ही रामत, रावटी करके भी समाज को जागृत करने के लिये गुरूजनो ने अपना सारी ताकत झोक दिये जिसका नतीजा यह निकला कि समाज में आपसी एकता और धार्मिक सहिष्णुता की भावना लोगो की मन में कुट-कुट कर समाहित होने लगी । गुरू बालकदास जी एवं गुरू अमरदास जी के जीवन चरित्र को जाने समझे बिना उनके सौर्य शक्ति का उचित आकलन नही किया जा सकता, गिरौदपुरी, भंडारपुरी, तेलासी, खड़ुवा, चटुवा, खपरी, कुँआ बोड़सरा, कुटेला, पचरी आदि धामो का इतिहास जो आज भी लोगो के जबान में यथावत है उन सच्ची घटनाओ को लिपी बद्ध करके हमें अपने गुरू जनो के अद्भुत कार्य को सम्मानित करना होगा जिसके द्वारा हमारे आने वाले पिढ़ी भी हमारे समाज की सच्ची गौरव गाथा को जान सके । यह कार्य हम सभी पढ़े लिखे साथियों का कर्ज है जिसे पूरा करना ही होगा ।

लेखक-श्री विष्णु बन्जारे सतनामी

Popular Posts