राजागुरू बालकदास के संदर्भ में महत्वपूर्ण ज्ञान : Shri Vishnu Banjare Satnami


परमपूज्य गुरू घासीदास बाबा जी के द्वतीय सुपूत्र गुरू बालकदास जी का जन्म, जन्माष्मी के दिन हुआ था । इसलिये सतनामी लोग पहले जैतखाम में जन्माष्टमी के दिन झंडा चढ़ाते थे जिसे पालो चढ़ाना कहा जाता था । गुरू बालकदास जी, गुरू घासीदास जी के साथ सामाजिक बुराइयों को दुर कर समाज को दिशा देने में लगे थे जिसके लिये महंत,राजमहंत, दीवान, भंडारी, साटीदार आदि बनाकर सतमार्ग पर चलने के लिये नियम बनाये और उस नियम (सतनामी एवं सतनाम धर्म के रिती नियम निचे लिखा गया है ) पर चलने के लिये प्रेरित करते रहे । गुरू बालकदास जी, अपने पिता, गुरू घासीदास जी के अनुयायीयों को सतनाम धर्म पालन करने के लिये, अमृत वाणियों का प्रचार कर कट्टरता से पालन करने के लिये आचार संहिता बनाकर समाज सुधार में लगे थे परिणाम स्वरूप समाज में गुरू बालकदासजी, गुरू बंशावली की गरिमा को बनाये रखते हुये गुरूजी के अनुयायियों को एकजुट करने में सफल हुये । गुरू बालकदास जी रामत के रूप में गाड़ी, घोड़ा, हाथी के साथ अपने महंतो, दीवानो को लेकर निकलते थे । समाज सुधार के साथ सामाजिक न्याय भी करते थे और अभियुक्त को दंड भी दिया करते थे । गुरू बालकदास जी कुँआ बोड़सरा को अपना कार्य स्थल चुने, गुरूजी का बहुतायत समय रामत घुमने में ब्यतित होते हुये । गुरूजी का विवाह ढारा नवलपुर (बेमेतरा) के निवासी मोतीलाल की सुपुत्री नीरा माता के साथ हुआ । नीरामाता, भूजबल महंत के बहिनी थी । उसी वर्ष गुरूजी ने चितेर सिलवट के बेटी राधा संग भी ब्याह किये । गुरूजी और राधा माता से साहेबदास और बड़ी पत्नी नीरामाता से गंगा और गलारा नाम की दो पुत्री हुई । भंडारपुरी में गुरूजी ने चौखण्डा महल बनवाया जिसमें तलघर, राजदरबार, मुसािफर खाना, पूजा स्थल, उपचार गृह, दीक्षा गृह बनवाये । महल में स्वर्ण कलश और अंगना में जोड़ा जैतखाम का स्थापना किये । गुरूजी रामत घुमते समय संतो को उपदेश के साथ साथ सतनाम की दीक्षा भी देते थे, जनेऊ पहिनाये, कंठी बांधे इस तरह समाज को सतनाम धर्म के सच्चे अनुयायी बनाते गये ।

लेखक-श्री विष्णु बन्जारे सतनामी

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