वार्षिक कार्यकर्ता सम्मेलन - सतनामी एवं सतनाम धर्म विकास परिषद


वार्षिक कार्यकर्ता सम्मेलन - सतनामी एवं सतनाम धर्म विकास परिषद


सतनामी एवं सतनाम धर्म विकास परिषद के संरक्षक श्री विष्णु बन्जारे सतनामी के मार्गदर्शन पर दिनांक 8 अक्टूबर 2017 के प्रातः 1000 बजे से परिषद की वार्षिक कार्यकर्ता सम्मेलन का आयोजन किया गया है। 

इस सम्मेलन में समस्त पदाधिकारियों एवं सदस्यों की उपस्थिति प्रार्थनीय है।



बैठक स्थल - महंतबाडा बिलासपुर  (महाराणा प्रताप चैक के पास)
दिनांक       - 8 अक्टूबर 2017, प्रातः 10 बजे से ........
(नोट रात्रि विश्राम की व्यवस्था की गई है।)


प्रदेश कार्यालय
सतनामी एवं सतनाम धर्म विकास परिषद, रायपुर
मोबाइल नंबर - 089592-34599

बिना कोचिंग के कलेक्टर/पुलिस अधीक्षक कैसे बनें ??

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आप सिविल सर्विसेस परीक्षा का तैयारी कर रहे हैं, तो इसे पढें
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दोस्तों यदि आप सिविल सर्विसेस (आईएएस, आईपीएस, आईएफएस) अथवा छत्तीसगढ़ पीएससी (डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी, नायब तहसीलदार एवं अन्य पदों) के अंतर्गत प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना चाहते हैं, अथवा कर रहे हैं तो आपको बिना किसी कोचिंग सेंटर जाए केवल इस पेज में दिये गये लिंक को ओपन करके सभी चैनल को सब्सक्राईब करते हुए बेल आॅईकाॅन को दबा देना है। जिससे इन यू-ट्यूब चैनल द्वारा जब कभी भी किसी भी प्रकार की प्ररीक्षापयोगी जानकारी/ शेयर किया जाता है, तो आप उक्त संबंध में जानकारी से पूर्णतः अपडेट रहेंगे।

ज्ञातव्य हो कि इन चैनलों में विशेषकर, दृष्टि आईएएस और एएफई आईएएस में सिविल सर्विसेस की तैयारी कैसे करना है। इस संबंध में पूर्व से ही विडियो ट्यूटोरियल अपलोड किये गये हैं, जिन्हे एक बार देख लेना आपके लिए अत्यंत उपयोगी साबित होगा। इसके साथ ही मैं आप सभी प्रतियोगी परीक्षा के अभ्यार्थियों से आग्रह करती हूं कि अपना तैयारी शुरू करने के साथ ही अथवा पहले इन चैनलों के लगभग सभी विडियोज आप एक बार जरूर देख लें।

AFEIAS    





बौद्धिक एवं व्यक्तित्व विकास के लिए ताकि आप सदैव सकारात्मक उर्जा से भरे रहें, आपको श्री संदीप माहेश्वरी एवं श्री टी.एस. मदान के यू-ट्यूब चैनल को भी सब्सक्राईब कर, इनके विडियोज को नियमित रूप से देख सकते हैं।

SandeepMaheshwari 

TsMadaan - Life Changing Videos in Hindi 




श्रीमती विधि हुलेश्वर जोशी
नया रायपुर, छत्तीसगढ़

सतनाम धर्म को संवैधानिक मान्यता प्रदान करने बाबत् माननीय राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन का प्रारूप

प्रति,
माननीय भारत के राष्ट्रपति महोदय
नई दिल्ली

विषय:- ‘‘सतनाम धर्म’’ को संवैधानिक मान्यता प्रदान करने बाबत् 
द्वारा:- जिलाध्यक्ष, जिला रायपुर, छत्तीसगढ़।


--0--

महोदय
ज्ञातव्य हो कि छत्तीसगढ़ राज्य के गिरौदपुरी धाम, जिला रायपुर (वर्तमान बलौदाबाजार) में 18 दिसम्बर सन् 1756 को अवतरित परमपूज्यनीय गुरू घासीदास बाबा के लोक कल्याणकारी कार्यों/योगदान के फलस्वरूप तथा जाति-पाति एवं वर्ण व्यवस्था के कारण उत्पन्न भेदभाव/छुआछूत, कथित सवर्णों के लोकदमनकारी गतिविधियों, डोला उठाने की प्रथा (स्थानीय गौटिया के द्वारा नव विवाहिता को 3दिवस केलिए रखैल की भांति रखने एवं दैहिक षोशण करने) को मिटाते हुए मनखे-मनखे एक समान के संदेष देने वाले, गुरूबाबा ने अपने स्वयं के तप एवं प्रताप के बल पर सतनाम धर्म का विधिवत् स्थापना किया एवं सम्पूर्ण मानव जाति के लिए सप्त सिद्धांत/सात मार्ग बताये। जो इसप्रकार है:-
1. सतनाम पर विष्वांस करना।
2. जीव हत्या नही करना। 
3. मांषाहार नही करना।
4. चोरी एवं जुआ से दूर रहना।
5. नषा सेवन नही करना।
6. जाति-पाति, उंच-नीच के प्रपंच में नही पडना।
7. पराय स्त्री को माता-बहन मानना।
(इस संबंध में आपके संज्ञान में यह बात लाया जाना आवष्यक है कि सतनाम धर्म में मूर्तिपुजा निशेध है, ब्राम्हण की पूजा एवं ब्रम्हणों से पूजा नही कराया जाता है।)

परमपूज्यनीय गुरू घासीदास बाबा के प्रभाव से नारलौल से आये (सन् 1672 में औरंगजेब के अत्याचारके खिलाफ सतनामी विद्रोह में पराजित सतनामी संत विषेशतः छत्तीसगढ़ में आ बसे) सतनामी संतो ंके साथ ही छत्तीसगढ़ के लगभग सभी जाति (ब्राम्हण, राजपूत, बनिया, मरार, तेली, यादव, कुर्मी, गोंड, इत्यादि), बौद्ध व हिन्दू धर्म एवं जो बौद्ध एवं हिन्दू धर्म को ग्रहण नही किये थे ऐसे लोग भी सतनाम धर्म को आत्मसात् कर सतनामी बने। वर्तमान परिवेष में परमपूज्यनीय गुरू घासीदास बाबा के 1 करोड से अधिक अनुयायी हैं, जो आपसे सतनाम धर्म की संवैधानिक मान्यता की आपेक्षा रखते हैं। ज्ञातव्य हो कि गुरू बाबा के जन्मस्थली गिरौदपुरी धाम में सतनामी, सतनाम धर्म एवं सत्य के प्रतीक भव्य जैतखाम का निर्माण छत्तीसगढ़ षासन द्वारा कराया गया है, जिसकी उंचाई कुतुबमीनार से उंचा है।

छत्तीसगढ़ की सामाजिक व्यवस्था में वर्तमान में एक नवीन पहल की षुरूआत हुई हैं, जिसके बारे में आपको जानकर अत्यंत पीडा होगी। क्योंकि कतिपय हिन्दू संस्थाओं एवं लोगों द्वारा आयोजित निजी/सार्वजनिक कार्यक्रमांे में दो पृथक-पृथक भोज का व्यवस्था किया जाता है। एक में हिन्दू के सभी जाति के लोग और दूसरे भोज में केवल सतनामी जाति के लोग। छत्तीसगढ़ के भूमि के सतनामी के लिए अलग मोहल्ला होता है किसी भी धार्मिक/सामाजिक एवं राजनैतिक योगदान के लिए सतनामी समाज के लोगों के लिए सतनामी संबोधन से संबोधित किया जाता है, जबकि षेश के लिए हिन्दू संबोधन होते हैं। ब्रिटीष काल की बात कहें तो सतनामी समाज की मांग के आधार पर अंगे्रज सरकार ने दिनांक 07/10/1926 को आदेष पारित किया और सतनामी जाति के लोगों को केवल सतनामी से संबोधित करने का आदेष दिया। शडयन्त्र के कारण सतनामी समाज तीन भाग/जाति (सतनामी, सूर्यवंषी सतनामी एवं रामनामी सतनामी) में बंट गये जिसके कारण आदिनांक तक सतनाम धर्म की संवैधानिक मान्यता के लिए उचित प्रयास संभव नही हो पाया है। सतनामी समाज के लोग अत्यंत स्वाभिमानी होते हैं, जिसके कारण किसी भी मानव को जाति-पाति के आधार पर उंचनीच नही मानते, जबकि मौजूदा हिन्दू धर्म ऐसे ही भावनाओं, रूढीवादी परम्पराओं, छुआ-छूत एवं उंच-नीच के भावनाओं से प्रेरित है। जिसके कारण सतनामी, स्वयं को हिन्दू कहलाने में असहज महसूस करते है और हिन्दू संबोधन का निंदा करते हैं।

हिन्दू धर्म से पृथक सतनाम धर्म की संवैधानिक मान्यता मांगने का दूसरा बडा कारण अत्यंत दूर्भाग्यजनक है, जिसका आपको संबोधित करते हुए बयान करना अनुचित होगा। इस संबंध में आपको अपने पीडा से अवगत कराते हुए केवल यही याचना करना चाहते हैं कि हम सतनामी समाज के लोग, दलित, षोशित, षुद्र अथवा नीच जाति के लोग कहलाना नही चाहते ऐसे संबोधन से हमारी धार्मिक आस्था चोटिल होती है और हमारा हृदय दर्द से कराह उठता है।

अतएव हम सतनामी समाज की ओर से एतद्द्वारा हिन्दू धर्म से पृथक सतनाम धर्म की संवैधानिक मान्यता हेतु आपसे आग्रह करते हैं।

स्थान - रायपुर, छत्तीसगढ़
दिनांक 19/09/2017

(हुलेष्वर जोषी सतनामी)
कार्यकारिणी सदस्य,
सतनामी एवं सतनाम धर्म 
विकास परिशद, छत्तीसगढ़, रायपुर

प्रतिलिपि: कृपया आवष्यक कार्यवाही/सूचनार्थ/अवलोकनार्थ।
1. माननीय प्रधानमंत्री महोदय, भारत सरकार, नई दिल्ली।
2. माननीय राज्यपाल महोदय, छत्तीसगढ़ षासन, रायपुर।
3. माननीय विधानसभा अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ विधानसभा, रायपुर।
4. सतनामी एवं सतनाम धर्म के सभी अनुयायी की ओर: षोषल मिडीया के माध्यम से  कृपया आवष्यक संषोधन हेतु प्रेशित है।

सतनाम धर्म की संवैधानिक मान्यता

एतद्द्वारा सतनामी संतों, माताओं और बहनों को यह बताते हुए अत्यंत खुसी हो रही हैं कि सतनामी एवं सतनाम धर्म के अनुयायी अब सतनाम धर्म की संवैधानिक मान्यता के लिए अपना प्रयास तेज कर चूके हैं। जिसे दृष्गित रखते हुए  हुलेश्वर जोशी सतनामी द्वारा माननीय राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री एवं स्थानीय प्रशासन को संबोधित करते हुए ज्ञापन तैयार करने का प्रयास किया गया है। सतनामी गुरूओं, संगठनों/समितियों के पदाधिकारियों से आग्रह है कि वे आवश्यक संशोधन के साथ अपनी मांग शासन/प्रशासन के समक्ष रखें।

ज्ञातव्य हो कि, भारतीय सतनामी समाज, रायपुर (पं. 25854) द्वारा दिनांक 28/09/2015 माननीय राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए अपना ज्ञापन सौपा गया है।

ज्ञापन के प्रारूप हेतु कृपया यहां क्लिक करें।

Smt. Vidhi Huleshwar Joshi
Naya Raipur, Chhattisgarh

सतनामी एवं सतनाम धर्म के अनुयायियों के मार्गदर्शन के संबंध में सामाजिक संगठनों, परिषदों एवं समितियों से विशेष आग्रह

सतनामी एवं सतनाम धर्म के अनुयायियों के मार्गदर्शन के संबंध में सामाजिक संगठनों, परिषदों एवं समितियों से विशेष आग्रह .....................


1. सतनामी समाज के सर्वांगीण विकास के लिए तत्पर समाज के सभी संगठनों/समूहों को मिलकर / साझेदारी करते हुए एक सामाजिक वेबसाईट एवं मोबाइल एप्लीकेशन की शुरूआत करना चाहिए। इसके माध्यम से सतनामी समाज के प्रत्येक नागरिकों, छात्र-छात्राओं, युवक-युवतियों, शासकीय व निजी क्षेत्र के अधिकारी/कर्मचारियों को उनके आवश्यकतानुसार निःशुल्क मार्गदर्शन (ईमेल/वाट्सएप एवं एसएमएस के माध्यम से) दिया जा सके। - इसके माध्यम से शासकीय योजनाओं एवं शासकीय नौकरियों के विज्ञापन इत्यादि के जानकारी से समाज को तत्काल अवगत कराया जाएगा।

2. समाज के छात्र/छात्राओं एवं बेरोजगार युवक/युवतियों के मार्गदर्शन/प्रतियोगी परीक्षाओं के तैयारी हेतु प्रत्येक विकास खण्ड स्तर अथवा प्रत्येक बडे सतनामी ग्राम में एक-एक निःशुल्क मार्गदर्शन एवं प्रशिक्षण केन्द्र खोला जावे। जिसमें 1या 1सेअधिक विडियो क्लासरूम (प्रोजेक्टर व कम्प्यूटर से अध्यापन एवं मार्गदर्शन हेतु) हो। जिसके माध्यम से देश के प्रमुख पदों (वैज्ञानिक, डाॅक्टर, पाॅयलट, आईएएस, आईपीएस, आईएफएस, इंजिनियर, प्रोफेसर, जज, अधिवक्ता इत्यादि हेतु प्रतियोगी परीक्षाओं के तैयारी कराया जा सके एवं मार्गदर्शन दिया जावे। ध्यान रखें सभी केन्द्र में केवल आॅपरेटर ही रखे जाऐंगे, किसी भी प्रकार के शिक्षक रखने की आवश्यकता नही होनी चाहिए। राज्य स्तर में केवल एक ही स्थान पर रिकार्डिग सेंटर तैयार किया जावेगा, जिसमें विशेषज्ञ के द्वारा अध्यापन एवं मार्गदर्शन किया जावेगा। रिकार्डिंग को यू-ट्यूब के माध्यम से अथवा अन्य माध्यम से संबंधित केन्द्र तक पहूचाया जावेगा। 

3. 10वीं उत्तीर्ण शिक्षा में कमजोर एवं शारीरिक रूप से सक्षम छात्र-छात्राओं को राज्य पुलिस, केन्द्र शासित प्रदेशों के पुलिस, राज्य एवं केन्द्रीय सशस्त्र बलों एवं तीनों सेनाओं में भर्ती हेतु ब्लाक स्तर पर विशेष प्रशिक्षण प्रदान किये जाऐंगे।

4. कंडिका 1 से 3 की पूर्ति हेतु समाज के दानदाताओं से अपील किया जावेगा कि वे मूर्तिपूजा व अन्य मंदिरों में चढावा के बजाय समाज को सहयोग प्रदान कर। प्रत्येक शासकीय सेवक अपने स्वेच्छानुसार 1 दिन का वेतन अथवा 500 रूपये सहयोग समाज के खाता में जमा करेंगे। बडे किसान, व्यापारी एवं निजी क्षेत्र के बडे पदों में आसीन व्यक्ति भी स्वेच्छानुसार समाज को दान करेगे। - इस हेतु राज्य के सभी मौजूदा संगठनों के अध्यक्षों एवं सचिव के योग से एक ट्रस्ट बनाया जावे, ट्रस्ट के खाता में दान एवं सहयोग राशि जमा हो।

5. प्रत्येक माता-पिता का दायित्व होगा कि वह अपने पाल्य को हाईस्कूल शिक्षा प्रदान कराये, अन्यथा स्थिति में समाज को शैक्षणिक कार्य हेतु सहयोग प्रदान करना होगा।

6. समाज का हर व्यक्ति अपने आप में सक्षम हो इस हेतु सभी संगठन मिलकर अपना अपना योगदान दें। 

7. सतनामी एवं सतनाम धर्म विकास परिषद के माध्यम से ग्राम गब्दी, पाटन जिला दुर्ग में एक सतनाम बाल संस्कार केन्द्र खोला गया है, जिसे अनुकरणीय पहल के रूप में स्वीकारा जा सकता है।

8. सतनामी कृषकों को परम्परागत कृषि के स्थान पर उन्नत कृषि अपनाने हेतु प्रेरित किया जावे। किसानों को अपने खेत में फलदार वृक्ष (अनार, आम, मुनगा, केला, अमरूद, पपीता, नीबु, कटहल इत्यादि) मसाले (तेज पत्ता, दालचीनी, मीठानीम, इत्यादि), इमारती लकडी एवं सब्जी लगाने हेतु प्रेरित किया जावे।

9. संभवतः पहलीबार प्रगतिशील सतनामी समाज द्वारा मृत्युभोज की अनिवार्यता समाप्त करने हेतु अनुरोध किया गया है, जो पूर्णतः मान्य योग्य है। इसके साथ ही पुरूष मृत्यु अथवा परिवार के कमाउ सदस्य के मृत्यु होने पर परिवार के जिम्मेदार महिला को संबंधित ग्राम, आसपास के ग्राम एवं सामाजिक संगठनों/समितियों को आर्थिक सहयोग करना चाहिए, साथ ही भविष्य में सहयोग के लिए तत्पर रहना चाहिए। 

10. किसी भी व्यक्ति के बिमार होने, अस्पताल में भर्ती होने की दशा में हम उन्हें अस्पताल में मिलने जाकर उन्हें सांत्वना देने के साथ ही उनके लिए आर्थिक एवं मानसिक बोझ भी बन जाते हैं। इसलिए हम जब भी किसी बिमार व्यक्ति से अस्पताल अथवा घर मिलने/देखने जायें, अपने परिजनों से सहयोग राशि मांग कर चाहे 2रूपये का हो पर अर्थिक सहयोग जरूर करें।

11. समाज के द्वारा मूर्तिपूजा को पूर्णतः बंद कर देना चाहिए।


HP Joshi Satnami
Naya Raipur, Chhattisgarh
Call 9406003006

गुरु अमरदास जयंती मनाने के संबंध में सुझाव

गुरघासीदास सेवा समिति, सतनामी समाज भोपाल द्वारा दिनांक ०९ जुलाई २०१७ को गुरुघासीदास गुरुद्वारा, मिलिंद नगर भोपाल में "गुरू अमरदास" जयंती का आयोजन किया गया है। इस आयोजन हेतु समिति के अध्यक्ष श्री किशन बंजारे सतनामी द्वारा संत समाज से आग्रह किया गया है कि संत समाज इस आयोजन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लें। 

सतनामी संतों ज्ञातव्य हो कि गुरु अमरदास की जयंती प्रत्येक वर्ष आषाढ़ गुरुपूर्णिमा के दिन ही मनाया जाता है। इस संबंध में कुछ विशेष सुझाव मैं संत समाज से share करना चाहता हूँ :-
1 समाज द्वारा आयोजित जयंती कार्यक्रम में क्रमशः पदयात्रा, चौकपूजा, ध्वजारोहण, पंथी नृत्य, भंडारा व प्रसाद वितरण व रात्रिकाल में सतनाम भजन/सतनाम प्रवचन अथवा गुरु बाबा के जीवन पर आधारित *लीला ही कराया जावे। किसी भी प्रकार से नाचा - गम्मत या सांस्कृतिक कार्यक्रम के माध्यम से सतनामी संस्कृति को भ्रष्ट न किया जावे न ही अनैतिक नृत्य व गान कराया जावे। ऐसा करना पूर्णतः निंदनीय व गुरु बाबा का अपमान है।*
2 समय समय पर साहू, यादव, मरार व गोंड़ समाज के मित्रों द्वारा आपत्ति दर्ज कराया गया है कि सतनामी संतों द्वारा बाबा जी पर एकाधिकार जमाते हुए हमें बाबाजी के जयंती में आमंत्रित नही किया जाता है न जयंती कराने के सम्बन्ध में आयोजित बैठक में बुलाया जाता है और न तो जयंती कार्यक्रम कराने पर योगदान (चंदा, इत्यादि) लिया जाता। बाबा जी तो लोककल्याणकारी हैं उनकी पूजा समस्त मानव समाज के द्वारा की जाती है, इसलिए कुछ लोग बिना पूछे ही जयंती कार्यक्रम में भाग लेकर बाबा जी का पूजन करते हैं तो कुछ भयवश दूर से ही बाबा जी को प्रणाम कर लेते हैं।
इसलिए संत समाज से निवेदन है कि बाबा जी के जयंती पर कमसेकम उपरोक्त समाज को जरूर शामिल करें। बाबाजी के पूजा करने का सबको अधिकार है, न कि केवल सतनामी को। *यदि हम नेता, मंत्री व कुछ प्रभावशाली लोगो को आमंत्रित करते हैं तो उनके समाज के सभी लोगो को क्यों नही? मनखे मनखे एक समान*

ऐसे बुद्धिस्टों व क्रिश्च्यानो को जो सतनामी समाज त्याग दिए हों, उन्हें सतनामी समाज के कार्यक्रम के दौरान माइक न दिया जावे। वे सतनामियों को भड़काकर धर्मपरिवर्तन करा सकते हैं या दीगर समाज से लड़ा सकते हैं।


हुलेश्वर जोशी सतनामी
कार्यकारिणी सदस्य
सतनामी एवम सतनाम धर्म 
विकास परिषद्, रायपुर (छत्तीसगढ़)
9406003006

छत्तीसगढ़ मेँ सतनाम धर्म के प्रमुख तीर्थस्थल एवं धाम

सतनामी एवं सतनाम धर्म के अनुयायितों के लिए यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि छत्तीसगढ़ राज्य में सतनाम धर्म के प्रमुख तीर्थ स्थल और धाम कहाँ-२ है।  

इसी उद्देश्य से हम सतनामी समाज को सतनाम धर्म के प्रमुख तीर्थस्थल एवं धाम के नाम बता रहे हैं। 

1. गिरौदपुरी धाम, जिला -बलौदाबाजार-भाटापारा
2. भंडारपुरी धाम, जिला -रायपुर
3. तेलासीपुरी धाम, जिला -बलौदाबाजार -भाटापारा
4. खपरीपुरी धाम, जिला -रायपुर
5. खड़ुवापुरी अगम धाम, जिला -बलौदाबाजार - भाटापारा
6. चटुवापुरी धाम, जिला -बेमेतरा
7. चक्रवाय धाम, जिला -बेमेतरा
8. कुंआ बोड़सरा, जिला -बिलासपुर
9. भिलाई सेक्टर-६, सतनाम भवन ,जिला-दुर्ग
10. लालपुर धाम, जिला -मुंगेली
11. उमरियापुरीधाम, जिला -बिलासपुर
12. पचरी धाम, जिला -जांजगीर-चांपा
13. पटाढ़ीपुरी धाम, जिला -कोरबा
14. अमरटापू मोतिमपुर, जिला -मुंगेली
15. कुटेलाधाम, जिला -बिलासपुर
16. औँराबाँधा, जिला-मुंगेली
17. जोगीकुआँ बैकुंठ धाम, जिला- रायपुर
18. बाराडेरा धाम, जिला- रायपुर
19. संतोष पुरी धाम, सिलयारी बाहरा, जिला गरियाबंद 

सतनामी संतों, माताओ और बहनों से आग्रह है कि यदि किसी भी तीर्थ स्थल / धाम के नाम छूट गए हों तो कमेंट बॉक्स में उनके नाम अवश्य बताएं, ताकि निकट भविष्य में जोड़ा जा सके। 

गिरौदपुरी धाम में सतनामी, सतनाम धर्म एवं सत्य का प्रतीक – भव्य जैतखाम का लोकार्पण

सतनामी एवं सतनाम धर्म के आस्था के प्रमुख केन्द्र पूज्य गिरौदपुरी धाम में राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री माननीय अजीतप्रमोद कुमार जोगी द्वारा घोषित कुतुम मीनार से उंचा जैतखाम को गुरूवंसज धर्मगुरूओं, छत्तीसगढ राज्य के तात्कालिक मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह, माननीय विस अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल, राज्य के समस्त माननीय सांसद, मंत्रीगण, विधायकगण, कलेक्टर, पुलिस अधीक्षकों सहित अन्य महत्वपूर्ण पदों पर आसीन अधिकारियों सहित देश विदेश में निवासरत सतनामी संतों, माताओं बहनों और देश विदेश से आए दर्शनार्थियों की उपस्थिति में धर्मगुरू विजय गुरू द्वारा दिनांक 18 दिसंबर 2015 को लोकार्पण किया गया ।




लोकार्पण के दौरान राज्य भर के विभिन्न समाजिक संगठनों व समितियों ने अपना योगदान दिया । सतनामी एवं सतनाम धर्म विकास परिषद रायपुर के प्रदेश अध्यक्ष श्री उत्तम बंजारे सतनामी, कोषाध्यक्ष श्री पिरेश ढीढी सतनामी, प्रदेश महासचिव श्री कुन्दन आडिल सतनामी व कार्यकारिणी सदस्य श्री हुलेश्वर जोशी सतनामी (सपरिवार) सहित परिषद के राज्य भर के लगभग 200 पदाधिकारी व सदस्य शामिल होकर लोकार्पण के साक्षी बने ।




राज्य सरकार द्वारा अनुसूचित जाति के आरक्षण में 4 फिसदी कटौती के कारण राज्य के विभिन्न समाजिक संगठनों द्वारा धर्मद्रोह का प्रदर्शन करते हुए भव्य जैतखाम के लोकार्पण में अनावश्यक विलंब के कारण बने । इस ऐसे विरोध का सतनामी एवं सतनाम धर्म विकास परिषद के मार्गदर्शक एवं संरक्षक श्री विष्णु बंजारे सतनामी के निर्देशानुसार परिषद द्वारा खण्डन किया गया और परिषद के अगुवाई में अनेकों समाजिक संगठनां व परिषद द्वारा लोकार्पण की अनुशंसा की गई । इस दौरान विरोध के संभावनाओं को मध्यनजर रखते हुए भारी पुलिस बल की तैनाती की गई थी इसके बावजूद भी विरोधियों को रोकने के लिए परिषद द्वारा तैयारी के साथ अधिक संख्या में युवक उपस्थित थे ।




अब तक राज्य सरकार, स्थानीय शासन व प्रदेशवासियों द्वारा भव्य जैतखाम को कुतुब मीनार से उंचा जैतखाम के नाम से संबोधित करते हुए लिखा जाता है इसे भव्य जैतखाम का अपमान घोषित करते हुए परिषद द्वारा दिनांक 02/12/2015 व 23/12/2015 को प्रेस विज्ञप्ति जारी कर भव्य जैतखाम को सतनामी, सतनाम धर्म एवं सत्य का प्रतीक – भव्य जैतखाम के नाम से जानने व संबोधित करने व लिखने हेतु शासन व प्रदेश वासियों से आहवान किया गया है ।



लेखक - हुलेश्वर जोशी सतनामी

सतनाम धर्म के संदर्भ में महत्वपूर्ण जानकारियां : Shri Vishnu Banjare Satnami

छत्तीसगढ़ की पावन धरा पर गुरू घासीदास जी का अवतरण सचमुच जीव जगत के जीवन में जोत जलाने के लिए हुआ था। गुरू ने नूतन व्यवस्था और नवीनधारा को परखा। उन्होंने पूॅजीवाद, समाजवादी तथा जातिवादी व्यवस्था के खिलाफ सत संदेश का प्रचार किया। गुरूजी ने सतनाम आंदोलन चलाकर सम्पूर्ण मानव को एक सूत्र में पिरोया और सतनाम आंदोलन से ही स्वाधीनता आंदोलन के स्वरूप का निर्धारण हुआ आगे चलकर स्वतंत्र भारत की कल्पना भी साकार हो सकी। सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप देने के लिये गुरूजी सघन दौरा कर समाजवाद के सिध्दांत को जन्म दिया। सतनाम आंदोलन को तीव्र गति को देने के लिये केन्द्र बिन्दु चिन्हित किया गया। सतनाम आंदोलन का मुख्य कार्यालय भंडारपुरी, तेलासी, बोड़सरा, चटुआ, खपरी, खडु़वा आदि स्थान से आंदोलन संचालित था।
इनके अलावा सतनाम आंदोलन के छोटे-छोटे कई बनाये गये थे जहाॅ से आंदोलन का संचालन किया जाता था। छत्तीसगढ़ में खासकर बिलासपुर, मुंगेली, रतनपुर, पंडारिया, कवर्धा, गंड़ई खैरागढ़, राजनांदगांव, पानाबरस, दुर्ग, रायपुर, तेलासी, बलोदाबाजार, सिरपुर, राजिम, रायगढ़, जगदलपुर, उड़ीसा, के कुछ भाग नागपुर, चन्द्रपुर, सारंगढ़ कुदुरमाल, नारायणपुर, बीजापुर, कोन्टा, सुकमा, तक संचालित थे। गुरू घासीदास जी के पश्चात् इस आंदोलन को और तेज गति प्रदान करने में किसी को अह्म भूमिका दिखता है तो छत्तीसगढ़ के राजा गुरू बालकदास जी हैं अंग्रेजों के समय ही छत्तीसगढ़ में सतनाम आंदोलन का प्रभाव बन गया था। सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ गुरू के समतावादी व्यवस्था से प्रभावित थे। सतनाममय छत्तीसगढ़ में गुरू के प्रभाव से ब्रिटिश सरकार भी अंचभित थे। इसलिए गुरू बालकदास को ब्रिटिश सरकार ने राजा की उपाधि से विभूषित कर अपने ओर मिलाने का भरसक प्रयास किया।
पर गुरू बालकदास में आजादी के सपने कूट-कूटकर भरा था, उन्होंने भारत के आजादी के लियें अपनों के साथ मिलकर नारायण सिंह को साथ लेकर काम किया। गुरू बालकदास ने अपने पिता के द्वारा चलाये रावटी प्रथा को तीव्र गति से बढ़ाया। इस गति में सोनाखान के बिझवार जमींदार रामसाय के पुत्र वीरनारायण गुरू के अच्छे मित्र रहे। दोनों ने अंग्रेजों के खिलाफ जमीदारी प्रथा, अकाल, भुख एवं अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष शुरू किया, यहीं कारण था कि गुरू बालकदास एवं वीरनारायण सिंह अंग्रेजों के लिए आंख की किरकिरी साबित हुए। सामंतवाद, साम्राज्यवाद तथा संभ्रातवाद के खिलाफ दोनों ने जमकर अगुवाई भी की। अन्याय, अत्याचार, रूढ़िवाद, और अंधविश्वास को जड़ से समाप्ति करने का बीड़ा भी गुरू बालकदास ने उठाया। अंग्रेजों ने गुरू के खिलाफ माहौल तैयार करने मुहिम चलाई, जिसमें मालगुजारों सामंतो व अपने को संभ्रांत समझने वालों ने अंग्रेजों का साथ दिया। छत्तीसगढ़ में सतनाम आंदोलन मूल रूप से सामाजिक आंदोलन का सामाजिक ढ़ंाचा में पहुंचाया, अंग्रेजो के खिलाफ प्रचार-प्रसार किया, गुरू का प्रभाव छत्तीसगढ़ के अनेक घरों तक पहुंचा। वे छत्तीसगढ़ समाज के बहादुर गुरू थे। गुरू ने सुरक्षा के लिये सेना का गठन कर उनका सुदृढ़ ढ़ंग से प्रशिक्षण चलाया। ब्रिटिश हुकूमत हिलने लगी थी।
अंग्रेजों ने नई चाल चला छत्तीसगढ़ के अन्य लोंगो को मिलाकर गुरू की छवि धूमिल करना शुरू किया तथा गुरू के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करने के लिये तरह-तरह का षड्यंत्र शुरू हुआ, गुरू बालकदास की ख्याति शक्तिशाली राजा के समान थी। गुरू ठाठ-बांट से रहते थे, हाथी पर सवार होकर सतनाम आंदोलन तथा सतनाम सेना का संचालन करते हुऐ रावटी प्रथा जारी की थी।
लेखक-श्री विष्णु बन्जारे सतनामी

सतनाम धर्म और राजागुरू बालकदास : Shri Vishnu Banjare Satnami


गुरू जी समाज को एकता के सूत्र में बांधने के लिये गाँव-गाँव में भंडारी, छड़ीदार, जैसे सम्मानित पदो का चुनाव किये ताकि प्रत्येक गाँव में सतनाम धर्म के रिजी रिवाजो के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान जैसे शादी-ब्याह, मरणी-दशगात्र जैसे समाजिक क्रिया क्रम सुगमता से किया जा सके । साथ ही महंत, राजमहंत जैसे सर्वोच्च सम्मानीय पदो का भी चुनाव योग्यता और समाजिक अनुभव को आधार मानते हुये किये इससे यह हुआ कि पुरा समाज गुरू से जुड़े रहे ।
दुसरी तरफ गुरू जी के बड़े भाई अध्यात्म गुरू के नाम से जाने-जाने वाले गुरू अमर दास जी ने सतज्ञान और सतमहिमा को आधार मानते हुये लोगो को सतनाम से जोड़ने का अनुकरणीय कार्य किये । जैतखाम, चौका पूजा, गुरू गद्दी, पंथी आदि के माध्यम से साथ ही रामत, रावटी करके भी समाज को जागृत करने के लिये गुरूजनो ने अपना सारी ताकत झोक दिये जिसका नतीजा यह निकला कि समाज में आपसी एकता और धार्मिक सहिष्णुता की भावना लोगो की मन में कुट-कुट कर समाहित होने लगी । गुरू बालकदास जी एवं गुरू अमरदास जी के जीवन चरित्र को जाने समझे बिना उनके सौर्य शक्ति का उचित आकलन नही किया जा सकता, गिरौदपुरी, भंडारपुरी, तेलासी, खड़ुवा, चटुवा, खपरी, कुँआ बोड़सरा, कुटेला, पचरी आदि धामो का इतिहास जो आज भी लोगो के जबान में यथावत है उन सच्ची घटनाओ को लिपी बद्ध करके हमें अपने गुरू जनो के अद्भुत कार्य को सम्मानित करना होगा जिसके द्वारा हमारे आने वाले पिढ़ी भी हमारे समाज की सच्ची गौरव गाथा को जान सके । यह कार्य हम सभी पढ़े लिखे साथियों का कर्ज है जिसे पूरा करना ही होगा ।

लेखक-श्री विष्णु बन्जारे सतनामी

राजागुरू बालकदास के संदर्भ में महत्वपूर्ण ज्ञान : Shri Vishnu Banjare Satnami


परमपूज्य गुरू घासीदास बाबा जी के द्वतीय सुपूत्र गुरू बालकदास जी का जन्म, जन्माष्मी के दिन हुआ था । इसलिये सतनामी लोग पहले जैतखाम में जन्माष्टमी के दिन झंडा चढ़ाते थे जिसे पालो चढ़ाना कहा जाता था । गुरू बालकदास जी, गुरू घासीदास जी के साथ सामाजिक बुराइयों को दुर कर समाज को दिशा देने में लगे थे जिसके लिये महंत,राजमहंत, दीवान, भंडारी, साटीदार आदि बनाकर सतमार्ग पर चलने के लिये नियम बनाये और उस नियम (सतनामी एवं सतनाम धर्म के रिती नियम निचे लिखा गया है ) पर चलने के लिये प्रेरित करते रहे । गुरू बालकदास जी, अपने पिता, गुरू घासीदास जी के अनुयायीयों को सतनाम धर्म पालन करने के लिये, अमृत वाणियों का प्रचार कर कट्टरता से पालन करने के लिये आचार संहिता बनाकर समाज सुधार में लगे थे परिणाम स्वरूप समाज में गुरू बालकदासजी, गुरू बंशावली की गरिमा को बनाये रखते हुये गुरूजी के अनुयायियों को एकजुट करने में सफल हुये । गुरू बालकदास जी रामत के रूप में गाड़ी, घोड़ा, हाथी के साथ अपने महंतो, दीवानो को लेकर निकलते थे । समाज सुधार के साथ सामाजिक न्याय भी करते थे और अभियुक्त को दंड भी दिया करते थे । गुरू बालकदास जी कुँआ बोड़सरा को अपना कार्य स्थल चुने, गुरूजी का बहुतायत समय रामत घुमने में ब्यतित होते हुये । गुरूजी का विवाह ढारा नवलपुर (बेमेतरा) के निवासी मोतीलाल की सुपुत्री नीरा माता के साथ हुआ । नीरामाता, भूजबल महंत के बहिनी थी । उसी वर्ष गुरूजी ने चितेर सिलवट के बेटी राधा संग भी ब्याह किये । गुरूजी और राधा माता से साहेबदास और बड़ी पत्नी नीरामाता से गंगा और गलारा नाम की दो पुत्री हुई । भंडारपुरी में गुरूजी ने चौखण्डा महल बनवाया जिसमें तलघर, राजदरबार, मुसािफर खाना, पूजा स्थल, उपचार गृह, दीक्षा गृह बनवाये । महल में स्वर्ण कलश और अंगना में जोड़ा जैतखाम का स्थापना किये । गुरूजी रामत घुमते समय संतो को उपदेश के साथ साथ सतनाम की दीक्षा भी देते थे, जनेऊ पहिनाये, कंठी बांधे इस तरह समाज को सतनाम धर्म के सच्चे अनुयायी बनाते गये ।

लेखक-श्री विष्णु बन्जारे सतनामी

सतनाम आंदोलन : Shri Vishnu Banjare Satnami

परम् पूज्य बाबा गुरू घासीदास जी के द्वितीय पुत्र राजा गुरू बालकदास जी के सतनाम आंदोलन का असर इतना अधिक हुआ कि अंग्रेजो ने सन् १८२५ में पहली बार शिक्षा का द्वार हिन्दु धर्म में शुद्र कहे जाने वालो के लिये खोले । गुरू बालकदास जी के एकता और समरसता के आंदोलन से अंग्रेज प्रभावित होकर उन्हे राजा घोषित कर हांथी भेंट किये साथ ही अंग रक्षक रखने कि अनुमति भी दिये । शिक्षा के क्षेत्र में हुये इस परिवर्तन कानून जिसका पुरोधा हमारे गुरू रहे, उन्ही के कारण ही १८४८ में महाराष्ट्र के पूना शहर में माली समाज में जन्मे ज्योतिराव फूले (जिन्हे अम्बेडकर जी अपना गुरू मानते थे) को पढ़ने का मौका मिला,फिर आगे चलकर इन्होने सत्य शोधक समाज की स्थापना १८७३ में किये ।

सतनाम आंदोलन को बढ़ते देख ब्राम्हण वाद तिलमिला उठे और मानव-मानव एक समान की भावना से ओत-प्रोत धर्म सतनाम को तोड़ने के लिये, सतनाम धर्म के समानांतर रामनामी सतनामी और सूर्यवंशी सतनामी पंथ खड़ा कर दिये । और िफर सतनामी समाज में नाना प्रकार के रिति-रिवाज, रहन-सहन, खान-पान, आचार-विचार के मानने वाले हो गये और यही वह सच्चा कारण है जिसके वजह से हमारी ताकत कमजोर हुई । साथीयो जब समाज ही अलग अलग पंथो में बटकर अलग अलग विचार धारा को मानने लगे है तो एक मत और एक सिद्धांत की बात करना ही गलत है । गुरूजी के सिद्धांत को त्याग अलग हो गये तो िफर किसी ब्यक्ति विशेष के सोंच का औचित्य ही क्या है । लेकिन आज हमे वह कमजोर कड़ी का पता चल चूका है तब हमारी जिम्मेदारी हो जाति है कि उन बुराईयो का त्याग करके जो गुरू जी ने हमारे लिये सच्चे रास्ते बनाये हैं उसमें सभी को चलने-चलाने का कार्य करना है ।


जब हम सब, फिर से सतनाम धर्म के रास्ते पर चलकर एकता और समरसता का ब्यवहार करेगें तो हमारी ताकत विशाल हो जायेगी,फिर हम सतनामी समाज को वह स्थान पर देख सकते है जो आज के बुद्धजीवी लोगो का सपना है । हमें गर्व है कि हम सतनामी कुल में जनम लिये जिन्होने दुनियाँ को एकता और भाईचारा का संदेश दिया है । और शिक्षा का द्वार सभी के लिये खोलने में अहम भूमिका अदा किये । सतनामी समाज तो एक है परन्तु राजनैतिक पार्टी अनेक तो भला ऐसा कैसे हो सकता है कि सभी के सभी सतनामी भाई किसी एक ही पार्टी से जुड़े, इस बात को हमें समझना होगा ।


गुरू जी के सतनाम आंदोलन को तोड़ कर रामनामी, सूर्यवंशी सहित अनेको संप्रदायो में विभाजित कर दिये तो किसी एक पार्टी के विचार को माने यह संभव ही नही है। हाँ परन्तु कोई ऐसी पार्टी हो जो सिर्फ सतनामी एवं सतनाम धर्म की बात को लेकर आगे आये तब की बात अलग है । अगर सतनामी समाज को एक सुत्र में बांधा जा सकता है तो वह सिर्फ सतनामी एवं सतनाम धर्म की बात को आगे बढ़ाकर ही किया जा सकता है, इसलिये सबसे पहले प्रयास यह होना चाहिये कि जो सतनामी समाज से अलग होकर पंथ बनाये हैं उन्हे पुनः सतनामी समाज के विचार धारा से जोड़ना ताकि सतनामी और अन्य विचार धारा वाले सतनामी में एकरूपता आये ।
लेखक-श्री विष्णु बन्जारे सतनामी

परमपुज्यनीया मिनी माता की जीवन परिचय : Shri Vishnu Banjare Satnami

ममतामयी मिनी माता द्वारा सतनाम धर्म और सम्पूर्ण भारत वर्ष से छूआछूत, भेदभाव और उंचनीच के भावो को समाप्त करने का प्रयास किया गया इनके द्वारा देश और धर्म के नाम पर किये गये कार्य सर्वश्रेष्ठ थी, इसलिए ही ममतामयी मिनी माता सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात हुई इसलिए हमें भी सतनाम धर्म के लिए उनके पद चिन्हों में चलते हुए स्वयं एवं धर्म के कार्यों में हिस्सा लेना चाहिए l
छत्तीसगढ़, जो कि मध्यप्रदेश के अंतर्गत आता था, का प्रथम महिला सासंद ममतामयी गुरू माता, मिनीमाता जी का जन्म 11 अगस्त 1972 को माताजी का पालम हवाई अड्डे के नजदिक विमान दुर्घटना में निधन हुई इस दिवस को हम प्रतिवषर्‍ ममतामयी मिनीमाता पुन्यतिथि के रूप में मनाने के लिए संकल्पित हैं l
मिनी माता का नाम मीनाक्षी देवी है, मीनाक्षी देवी आसाम में अपनी माँ देवबती के साथ रहती थीं। देवबती जब छोटी थीं, तो वे छत्तीसगढ़ में रहती थीं। उनके पिताजी सगोना नाम के गाँव में मालगुज़ार थे। छत्तीसगढ़ में सन् 1897 से 1899 तक अकाल पड़ा जो इतना भयंकर था कि लोग उसे "दुकाल" के नाम से जानने लगे थे । देवबती तब बहुत ही छोटी थीं। उनकी और दो बहनें थीं। एक उनसे बड़ी दूसरी उनसे छोटी। तीन बेटियों को लेकर उनके पिता-माता शहर विलासपुर पहुँचे। वहाँ उन्हें आसाम के एक ठेकेदार मिले जो मज़दूर भर्ती करने वाले थे। उनके साथ देवबती के पिता सपरिवार आसाम जाने के लिए तैयार हो गए। देवबती की दोनों बहनें आसाम नहीं पहुँच पाई। बड़ी बहन मती ट्रेन में ही चल बसी। उस नन्ही-सी बच्ची को गंगा में अपंण करना पड़ा, और छोटी बहन जिसका नाम चांउरमती था, उनको पद्मा नदी में। किसी तरह तीनों मिलकर जब आसाम पहुँचे, तब पिता-माता दोनों चल बसे। देवबती बीमारी से तड़प रही थीं, उसे किसी ने अस्पताल में भर्ती कर दिया। ठीक होने के बाद देवबती अस्पताल में ही रह गईं। नर्सो ने उन्हें बड़े प्यार से बेटी के रुप में पाला। उसी देवबती की बेटी थीं मीनाक्षी देवी। आसाम में उन्होंने मिडिल तक की पढ़ाई की। सन् था 1920 । उस वक्त स्वदेशी आन्दोलन चल रहा था। छोटी-सी मिनी स्वदेशी पहनने लगी। विदेशी वस्तुओं की होली भी जलाई। उस वक्त गुरु गद्दीनसीन अगमदास जी गुरु गोसाई (सतनामी पथ के) धर्म का प्रचार करने आसाम पहुँचे। वहाँ मिनी के परिवार में ठहरे थे। उन्होंने मिनी के माताजी के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। इसी प्रकार मीनाक्षी देवी मिनी माता बन गईं और छत्तीसगढ़ वापस आईं।
अगमदास गुरु राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग ले रहे थे। उनके रायपुर का घर सत्याग्रहियों का घर बना। पं. सुन्दरलाल शर्मा, डॉ. राधा बाई, ठाकुर प्यारेलाल सिंह - सभी उनके घर में आते थे। अगमदास गुरु के कारण ही पूरे सतनामी समाज ने राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया। मिनी माता सब के लिए माता समान थीं। वे हमेशा उन लोगों की मदद करने के लिए तैयार रहती थीं, जिनका कोई नहीं है जिन पर समाज दबाव डाल रहा है। जो कोई भी परेशानी में होता, मिनी माता के पास आ जाता और मिनी माता को देखकर ही उन के मन में शांति की भावना छा जाती। अनेक लोग यह कहते कि क्या जो जन्म देती है, वही माँ है? माँ तो वह है जिसे देखते ही ऐसा लगे कि अब और किसी बात का डर नहीं। अब तो माँ है हमारे पास। सन् 1951 में अगमदास गुरु का देहान्त हो गया अचानक। मिनी माता पर अगमदासजी गुरु की पूरी ज़िम्मेदारी आ पड़ी। घर सँभालने के साथ-साथ समाज का कार्य करती रहीं पूरी लगन के साथ। उनका बेटा विजय कुमार तब कम उम्र का था। 1952 में मिनी माता सांसद बनी। तब से उनकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ गई। ऐसा कहते हैं कि हर काम को जब तक पूरा नहीं करतीं, तब तक वे चिन्तित रहती थीं।
नारी शिक्षा के लिए मिनी माता खूब काम करती थीं। सभी को कहती थीं अपनी बेटियों को पढ़ाने के लिए। बहुत सारी लड़कियाँ उनके पास रहकर पढ़ाई करतीं। जिन लड़कियों में पढ़ाई के प्रति रुचि देखतीं, उनके लिए ऊँची शिक्षा का बन्दोबस्त करतीं, उन लड़कियों में से आज डॉक्टर हैं, न्यायधीश हैं, प्रोफ़ेसर हैं। छत्तीसगढ़ साँस्कृतिक मंडल की मिनी माता अध्यक्षा रहीं। छत्तीसगढ़ कल्याण मज़दूर संगठन जो भिलाई में है, उसकी संस्थापक अध्यक्षा रहीं। बांगो-बाँध मिनी माता के कारण ही सम्भव हुआ था।
मिनी माता का सभी धर्मों के लिए समान आदर भाव था। मिनी माता सभी से यही कहती थीं कि लोगों का आदर करें, सम्मान करें। मिनी माता छत्तीसगढ़ राज्य के आन्दोलन में शुरु से ही सक्रिय हिस्सा लेती रही थीं। सन् 1972 में एक वायुयान भोपाल से दिल्ली की ओर जा रहा था। मिनी माता भोपाल में अपने बेटे विजय के पास आई थीं। उसी वायुयान से दिल्ली वापस जा रही थीं। उस वायुयान में चौदह यात्री थे। वह वायुयान दिल्ली नहीं पहुँच पाया, उसी दुर्घटना में हमारी मिनी माता भी अपना काम अधूरा छोड़ कर चली गयीं। छत्तीसगढ़ में लोग विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि मिनी माता अब उनके बीच नहीं रहीं।
मीनाक्षी देवी उर्फ मिनी माता सन् 1952 में मिनी माता सांसद बनी थीं। उन्होंने देश के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण काम किया था। छुआछूत मिटाने के लिए उन्होंने इतना काम किया कि मिनी माता को लोग मसीहा के रुप में देखा करते थे। उनके घर में हर श्रेणी के लोग आते थे और मिनी माता उनकी समस्याओं को हल करने में पूरी मदद करती थीं। ऐसा कहते हैं कि जब वे सांसद के रुप में दिल्ली में रहती थीं तो उनका वास स्थान एक धर्मशाला जैसा था। छत्तीसगढ़ से जो कोई भी दिल्ली में आता, वह निशचिंत रहता कि मिनी माता का निवास तो है। ठंड के दिनों में मिनी माता ध्यान रखतीं कि कोई भी ठंड से परेशान न हो। अगर किसी को देखतीं कि ठंड से सिकुड़ रहा है तो उसको कंबल से ढंक देतीं। एक बार तो ऐसा हुआ कि उनके पास खुद को ओढ़ने के लिए कंबल नहीं रहा। बहुत ज्यादा ठंड हो रही थी। मिनी माता ने एक सिगड़ी जला कर खाट के नीचे रख दिया, पर सिगड़ी का धुँआ पूरे कमरे में भर गया और बहुत ज्यादा घुटन हो गई, जिसके कारण मिनी माता बेहोश हो गईं। कई दिन तक चिकित्सा चलने के बाद वे ठीक हुईं।
लेखक-श्री विष्णु बन्जारे सतनामी

गौ हत्या के विरूद्ध सतनाम धर्म का प्रयास : Shri Vishnu Banjare Satnami & Shri Huleshwar Joshi Satnami

सतनाम धर्म के संस्थापक परमपुज्यनीय गुरूघासीदासजी द्वारा गौ-हत्या के विरूद्ध अनेको संदेश दिये गये फलस्वरूप गुरू अगमदास गोसाई के अगुवाई में सतनामी समाज के महान सपूतो जिनमें प्रमुख रूप से :- १. राजमहंत नैनदास मंत्री, २. राजमहंत अंजोरदास व्हाइस प्रेसीडेंट एवं ३. राजमहंत विशालदास एवं अन्य 27 सतनामी सपुतों द्वारा सन् 1937 में गौहत्या विरोधी अभियान चलाये फलत: अंगरेजो द्वारा एक महत्वपूर्ण परिपत्र जारी किया गया जिसका शीर्षक है- "श्री गौ-माता की जै" इसके तहत करमनडीह, ढ़ाबाड़ीह में बने विशाल बुचड़ खाना जिसमे प्रतिदिन हजारो बेजुबान जानवरो कि निरमम हत्या किया जाता था, उसे अंग्रेजो को बंद करना पड़ा ।

अगर हमारे इन सतनामी सपूतो का साथ दुसरे समाज वाले भी दिये होते तो सिर्फ करमडीह, ढ़ाबाड़ीह मे ही नही बल्कि पुरे भारत देश में गौ-हत्या पुरी तरह बंद हो गया होता । हमें गर्व है अपने उन महापुरूषो पर जिन्होने अपने दम पर इतना बड़ा मुहिम चलाकर सफलता प्राप्त की ।
और इस कार्य के लिये नैनदास और अंजोर दास को गौ-भक्त की उपाधी से सम्मानित किया गया ।
इस संबंध में ज्ञातव्य हो कि सतनाम धर्म में उस समय भी इतने शक्तिशाली/प्रभावशाली लोग थे कि क्रुर अंग्रेजों को भी झूकने पर मजबंर कर दिये lतो हम आज कैसे शक्तिहीन हो सकते हैं ?
सतनाम धर्म के इस कामयाबी के बाद यह गीत काफी प्रसिद्ध हआ, जिसे लोग धार्मिेक एवं सांस्क्रितिक कार्यक्रमों में गाया करते थे, वह इसप्रकार है :-
मोर नैनदास भईया
अंजोरदास भईया
गौ बध के छोड़ईया.......
मोर नैनदास भईया.....


नैनदास हर गोल्लर बनगे
अंजोरदास हर बीजरा
बिशाल महंत के गोठ ल सुनके
कतको ल आवय तीजरा....
मोर नैनदास भईया.....

इसलिए मेरा आप सभी सतनामी भाईयों से निवेदन है कि आप अपने शक्ति को पहचानो, परमपुज्यनीय गुरूघासीदासजी द्वारा बताये गये मार्ग का अनुकरण कर स्वयं को सर्वोच्च प्रमाणित कर दो, आप सभी के जानकारी के लिए मुझे यह बताना आवश्यक लगता है कि हम सर्वदा से श्रेष्ठ है और सर्वदा श्रेष्ठ ही रहेंगे l कुछ सडयन्त्रकारियों द्वारा हमारे शक्तिको हमारे मनोसिथति को प्रभावित करने के लिए छोटेजाति के समकक्ष लाने के नियत से अनुसूचित जाति में शामिल कर दिया गया,
परन्तु हम कभी इन कथित छोटेजाति के लोगों के समकक्ष थे ही नही वरन हम सदैव से ही ज्ञानी और संतजन थे, आप हमारे इतिहास को जानने का प्रयास करेंगें तो ही ज्ञात होगा कि हम कितने धर्मसम्पन्न थे अैार कितने धन सम्पन्न थे l इसलिए हे सतनामी भाईयों जागो और अपने सम्मान की पुर्नप्राप्ति के लिए स्वयं को ज्ञान, शक्ति एवं सम्पन्नता के माध्यम से श्रेष्ठ प्रमाणित कर दो ll सतनामी कभी किसी से छोटा था, है न रहेगा, न मानेगा, न स्वीकारेगा केवल सम्मान प्राप्ति के लिए भिन्न-भिन्न स्तरों में संघर्ष करेगा ll

Written By 
Shri Vishnu Banjare Satnami & 
Shri Huleshwar Joshi Satnami

सतनाम धरम के मनईया महतारी अउ बहिनी बर पाती : Shri Huleshwar Joshi Satnami


सतनाम धरम के मनईया जम्मों दाई अउ बहिनी मन ले चरण स्पर्स करत, हुलेश्वर जोशी के बिनती हवय कि आप अइसन बेटा बेटी ल जनम देवव जेन ह सतनाम धरम के परम्परा ल आगु बढाये खातिर संत रूप म भंवसागर ल तार देवय, दुनिया भर म सतनाम धरम ल किर्ति परदान करा सकंय l आपन ले बिनती हवय आप अपन कोख के जनम देय अंश ल शाकाहार, परोपकार, दयावान अउ धरमवान बनाये के जतन करव जेकर ले विश्व के महान संतजनों के सतनाम धर्म को पुनस्थापित करे म आपके योगदान मिल सकय l अपन अंश ल सत्यकरम करे खातिर परेरित करव, सतनाम धरम के संस्थापक परमपुज्यनीय गुरूघासी दास के बताये रस्दा म चले के ताकत अउ परेरना देवव l आपन अपन देवीय ताकत ल जानव कि आप अपन गरभ के भीतरी म, कोख म अपने जइसे मनखे ल गढ सकथव त ऐहु बात त गांठ धरके बांध लव आपन अपन गरभ के भितरीम ओकर जिनगी के रस्दा धलो निरधारित कर सकत हव अउ ओकर जीनगी के आवसियकता ल निरधारित करके ओकर अंतस म गियान ल पिरो सकत हव अउ ओला ताकत दे सकत हव l हे दाई बहिनी होव मोर बखाने आपन के उक्त गुण ह सांकेतिक आए असली ताकत ल आपन सुवयम ही जानसकत हव अउ दुसर आदिपुरूष सतनाम l


सतनाम धरम के अनुयायी होए खातिर आपन के करतबिय होतहे कि आप सतनामी समाज ल एक जिम्मेदार अउ सच्चा मनखे/अंश परदान करव l आपके आशिष ले जनम लेवईया अंश ह केवल अउ केवल आपके ही इक्च्छानुसार करतबिय करही, आपके पुन्यपरताप के अनुसार ही आपके अंश के भविशय ह निरधारित होही l एकरे सेती ले मय ह बार-बार आपन के बिनती करत हंव कि आप सतनाम धरम के हित ल धियान धरके ही अपन अंश के निरमान करव l
एक इसतिरी के जीवन कब सुफल होथे :- इसतिरी जनम के सुफलता के समबंध म माता श्यामा देवी अउ सतनाम धरम के संतसमाज ले जेन गियान मिले हवय ओकर अनुसार मय ह आपन ले इसतिरी जनम के सुफलता के बिषय म जानकारी दिये के परयास करत हंव :: एक इसतिरी के जीनगी तबे सुफल होथे जब वो अपन अंश के रूप म बेटी नईते बेटा ल जनम देथे, अंश के निरमान बिना एक इसतिरी के जीनगी बियरथ खईता हो जाथे l जब माता के रूप म कुमाता नई बनय अउ कुपुतर नईते कुपुतरी बने ले अपन अंश ल बचा लेथे, मतलब ओकर अंश ह धरम के रस्दा म चलथे, तबे एक इसतिरी के जीनगी ह सुफल होथे l
परतेय महतारीन ले मोर बिनती हवय कि ओ अपन अंश ल सही रस्दा देखावय अउ धरम के मारग म चलावय l जेन महतारी के अंश ह सत के मारग ल अपन धरम जान लेथे अउ ओकरेच अनुरूप करम करथे, अइसन बेटा/बेटी के महतारी बर अमरलोक म एक उत्तम पद निरधारित हो जोथे l


नारी बर नवा रसदा :- संत समाज म प्रचलित प्रथा के अनुसार नारी जीवन के मरम ल बताये के सुअवसर ह मोर बर बड भागिय के बिसे आए, नारी जीनगी म करना चाही अउ का नई करना चाहि ए बिसे ह महतपुरन आए जेला मय निचे लिखत हंव –
1. परतेक नारी देवी के स्वरूप आए, नारी के सनमान देवी जस करे जाए चाहि नारी ह महतारी, बहिनी, बेटी, बहु या परइसतिही के रूप म होय l
2. नारी जीवन म उत्तम इसथान पति के होथे, ओकर बाद सास-ससुर : माता-पिता : धर्मगुरू /आदि पुरूष : अंश : देवर-ननद : कुल के समस्त सदस्य : समाज : सतनाम धर्म के समस्त अनुयायी और भवसागर के जम्मो जीवन धारी परानी l जबकि विवाहपूर्व माता-पिता के इसथान उत्तम होथे l
3. परतेक नारी ल शाकाहारी होना चाही अउ सतनाम धरम के बारे म समपुरन गियान होना चाही, जेकर ले सुवयम अउ अपन अंश ल धरम के पुरन गियान दे सकय l
4. परतेक इसतिरी ल (विधवा माता/बहन ल छोडके) सदैव सिंगार करना चाही अउ पति के प्रति निसठा रखना चाही l


5. परतेक नारी ल सदा ही धरम रक्षा अनुरूप अंश को जनम देना चाही अउ अपन अंश ल धरमवान बनाये के नियति करना चाही l
6. पति अउ सास-ससुर के सेवा सदा ही करना चाही l
7. सतनाम धरम अउ परमपुज्यनीय गुरूघासीदास के बताये रसदा म चलत अपन जीनगी के जम्मो करम ल करना चाही l

महतारी अउ बहिनी मन बर लिखे पतिया के पठन-पाठन करे ले महतारीन अउ बहिनी के जीनगी अमर हो जाही l

लेख : हुलेश्वर जोशी सतनामी

चक्रवाय धाम : Shri Huleshwar Joshi Satnami

परमपुज्यनीय गुरूघासीदास द्वारा स्थापित सतनाम धर्म के अन्तर्गत श्री डेरहू प्रसाद घृतलहरे द्वारा ग्राम चक्रवाय में अलौकिक और अद्भुत गुरू घासीदास बाबा जी का मंदिर निर्माण कराया गया हैं जहाँ प्रतिवर्ष दिसंबर माह गुरू घासीदास जयंती पर्व के अंत में १-२-३ जनवरी को सामाजिक भब्य मेला का आयोजन होता है। इस भव्य मंदिर के नाम से कुछ लोग इसे चक्रवाय धाम के नाम से जानने लगे है, जो सतनामी समाज के लिए सौभाग्य की बात है l
इस मंदिर में प्रवेश करने से भक्तजनों की चाहे वह सतनाम धर्म की अनुयायी हो अथवा न हो कि समस्त वैध मनोकामनाएं पुरी होती है, अवैध और पापकर्म की मनोकामनाओं से परिपूर्ण भक्तजन मनोकामनापूर्ति की आपेक्षा न रखें, क्यों कि ऐसा संभव नही होता, सतनाम धर्म के अन्तर्गत अवैध एवं पापकर्म से प्रेरित मनोकामनाओं की कोई स्थान नही है, ऐसे कर्म करने वाले व्यक्ति स्वयं को सतनामी न कहें l परम पुज्यनीय मालिकराम जोशी कहते थे कि "गुरूघासीदासजी से ऐसा कोई आपेक्षा न रखो जो सत्य, धर्म और राष्ट हित को आहत पहुंचाता हो" इसलिए समस्त सतनामी भाईयों और दर्शनार्थियों से आग्रह है कि यहां और अन्य सभी सतनाम धर्म के मदिरों में मनोकामनापूर्ति हेतु उक्त भाव/बातों का ध्यान रखा जावे l
इस मंदिर का निर्माण श्री डेरहूप्रसाद घ़तलहरे पिता श्री सुखरू प्रसाद घृतलहरे जन्म तिथि 28 जून 1949 ग्राम चक्रवाय तहसिल नवागढ़ जिला बेमेतरा द्वारा कराया गया है, श्रीघ़तलहरेजी, अभिरूचि, समाज सेवा, जन सेवा और दिन-हिन ब्यक्तियोंका मदद करते है और परमपूज्य बाबा गुरू घासीदास जी के सच्चे अनुयायी है और गुरूजी के बताये मार्ग पर चलते हुये जीवन का निर्वहन करना उनका एकमात्र लक्ष्य है । माता पिता का वंदन प्रतिदिन गुरू बाबा जी के वंदन के साथ करते हैं और गरीबो की प्रथम सुनवाई एवं सेवा कार्य को अपना करतब्य मानते हैं । इसलिए हम इनके सम्मान के लिए इन्हे सच्चे सतनामी पुत्र की उपाधी से विभूषित करते हैं l
लेखक- हुलेश्वर जोशी सतनामी
(श्री विष्णु बन्जारे सतनामी के मार्गदर्शन पर)

राजा गुरू बालकदास जी के सतनाम आंदोलन : Shri Vishnu Banjare Satnami

परम् पूज्य बाबा गुरू घासीदास जी के द्वितीय पुत्र राजा गुरू बालकदास जी के सतनाम आंदोलन का असर इतना अधिक हुआ कि अंग्रेजो ने सन् १८२५ में पहली बार शिक्षा का द्वार हिन्दु धर्म में शुद्र कहे जाने वालो के लिये खोले । गुरू बालकदास जी के एकता और समरसता के आंदोलन से अंग्रेज प्रभावित होकर उन्हे राजा घोषित कर हांथी भेंट किये साथ ही अंग रक्षक रखने कि अनुमति भी दिये । शिक्षा के क्षेत्र में हुये इस परिवर्तन कानून जिसका पुरोधा हमारे गुरू रहे, उन्ही के कारण ही १८४८ में महाराष्ट्र के पूना शहर में माली समाज में जन्मे ज्योतिराव फूले (जिन्हे अम्बेडकर जी अपना गुरू मानते थे) को पढ़ने का मौका मिला,फिर आगे चलकर इन्होने सत्य शोधक समाज की स्थापना १८७३ में किये । सतनाम आंदोलन को बढ़ते देख ब्राम्हण वाद तिलमिला उठे और मानव-मानव एक समान की भावना से ओत-प्रोत धर्म सतनाम को तोड़ने के लिये, सतनाम धर्म के समानांतर रामनामी सतनामी और सूर्यवंशी सतनामी पंथ खड़ा कर दिये । और िफर सतनामी समाज में नाना प्रकार के रिति-रिवाज, रहन-सहन, खान-पान, आचार-विचार के मानने वाले हो गये और यही वह सच्चा कारण है जिसके वजह से हमारी ताकत कमजोर हुई । साथीयो जब समाज ही अलग अलग पंथो में बटकर अलग अलग विचार धारा को मानने लगे है तो एक मत और एक सिद्धांत की बात करना ही गलत है । गुरूजी के सिद्धांत को त्याग अलग हो गये तो िफर किसी ब्यक्ति विशेष के सोंच का औचित्य ही क्या है । लेकिन आज हमे वह कमजोर कड़ी का पता चल चूका है तब हमारी जिम्मेदारी हो जाति है कि उन बुराईयो का त्याग करके जो गुरू जी ने हमारे लिये सच्चे रास्ते बनाये हैं उसमें सभी को चलने-चलाने का कार्य करना है । जब हम सब, फिर से सतनाम धर्म के रास्ते पर चलकर एकता और समरसता का ब्यवहार करेगें तो हमारी ताकत विशाल हो जायेगी,फिर हम सतनामी समाज को वह स्थान पर देख सकते है जो आज के बुद्धजीवी लोगो का सपना है । हमें गर्व है कि हम सतनामी कुल में जनम लिये जिन्होने दुनियाँ को एकता और भाईचारा का संदेश दिया है । और शिक्षा का द्वार सभी के लिये खोलने में अहम भूमिका अदा किये । सतनामी समाज तो एक है परन्तु राजनैतिक पार्टी अनेक तो भला ऐसा कैसे हो सकता है कि सभी के सभी सतनामी भाई किसी एक ही पार्टी से जुड़े, इस बात को हमें समझना होगा । गुरू जी के सतनाम आंदोलन को तोड़ कर रामनामी, सूर्यवंशी सहित अनेको संप्रदायो में विभाजित कर दिये तो किसी एक पार्टी के विचार को माने यह संभव ही नही है। हाँ परन्तु कोई ऐसी पार्टी हो जो सिर्फ सतनामी एवं सतनाम धर्म की बात को लेकर आगे आये तब की बात अलग है । अगर सतनामी समाज को एक सुत्र में बांधा जा सकता है तो वह सिर्फ सतनामी एवं सतनाम धर्म की बात को आगे बढ़ाकर ही किया जा सकता है, इसलिये सबसे पहले प्रयास यह होना चाहिये कि जो सतनामी समाज से अलग होकर पंथ बनाये हैं उन्हे पुनः सतनामी समाज के विचार धारा से जोड़ना ताकि सतनामी और अन्य विचार धारा वाले सतनामी में एकरूपता आये ।
लेखक-श्री विष्णु बन्जारे सतनामी

राजागुरू बालकदास जयन्ती 18 अगस्त 2014 (सतनाम संकल्प दिवस) प्रथम आयोजन : Shri Huleshwar Joshi Satnami

अत्यंत हर्ष के साथ समस्त संत समाज को अवगत कराया जा रहा है कि इस वर्ष १८-०८-२०१४ को राजा गुरू बालकदास साहेब जी के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में गुरू घासीदास बाबा जी के तपोभूमि गिरौदपुरी धाम में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ, समस्त गुरू वंशज धर्म मंच पर विराजमान होकर सभी संत समाज को दर्शन दिये और अमृत वचनो से संबोधित किये। इस शुभ अवसर पर समाज के लोगो में उमंग देखते ही बन रहा था चारो तरफ सतनाम का जयघोष सुनाई पड़ रही थी साथ में उपस्थित सतनाम सेना के सिपाही अखाड़ा का भी प्रदर्शन कर रहे थे। गुरू वंशजो को एक मंच में देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो जैसा स्वर्ग में विराजमान देव शोभा पाते हैं वैसा ही शोभा गिरौदपुरी धाम में गुरू वंशज पा रहे हैं।

समस्त गुरूजनो ने एक साथ मंदिर में स्थापित गुरू गद्दी में शीश झुकाये और परमपूज्य गुरू घासीदास बाबा जी से प्रार्थना किये कि समस्त संत समाज के उपर कृपा बनाये रखिये और जो भी विपत्ती आज तक समाज में आयी रही होगी उसे दुर करके समस्त मानव जगत को सुखमय और प्रसन्नता से जीवन जीने का आशिष प्रदान किजीये।
गुरू बालकदास जयंती के कार्यक्रम में सम्मिलित समस्त संत समाज भाव विभोर होकर गुरू वंशजो का आभार प्रकट कर रहे थे उनके चेहरो में जो खुशी झलक रही थी उसको शब्दो में नही लिखा जा सकता । गुरू वंशज भी संत समाज के भावनाओ को देखते हुये आगे सभी तरह के कार्यो में एकमत होकर समाज को दिशा देने हेतु संकल्प लिये।

गुरू वंशजो का दर्शन पाकर समस्त संत समाज अपने भाग्य का सराहना कर रहे थे, साथियों अब हम समस्त संत समाज का जिम्मेदारी बन जाता है कि गुरू जनो के मार्गदर्शन में काम करें और छत्तीसगढ़ ही नही बल्कि पुरे देश में सतनाम धर्म की पुर्नस्थापना हेतु दृढ़ संकल्प लेकर एकजुटता और एकरूपता के साथ समाज को आगे बढ़ाने हेतु प्रयास करें। हम धन्य है जो ऐसे समाज में जन्म लिये जहाँ गुरू घासीदास बाबा जी के वंशज हमें सभी क्षेत्रो में मार्गदर्शन देने हेतु सक्षम हैं। चाहे वह अध्यात्म के क्षेत्र में हो, या राजनिती के क्षेत्र में हो, या धर्म के क्षेत्र में हो या सामाजिकता के क्षेत्र में हो । यह तो सर्व विदित है बिना मुखिया के कोई भी काज सफल नही हो पाता और हम सौभाग्यशाली हैं जिनका मुखिया गुरू घासीदास बाबा जी के वंशज हैं ।
साथियों आज तक जो भी परिस्थिती रही हो उन सभी को भूलाकर, एकमत होकर, समाज को सभी क्षेत्रो में आगे बढ़ाने हेतु मिलजुल कर कार्य करें । अब वह दिन दुर नही जब देश के कोने कोने में सतनाम का नाम गुंजायमान होगा, क्योकि "मानव-मानव एक समान" के मूल मंत्र को लेकर हमें समस्त मानव जगत को सतनाम का संदेश देना है और सतनाम धर्म की ख्याति और सम्मान को पुर्नस्थापित करना है। हमारे समाज में छोटे बड़े अनेको सामाजिक संगठन हैं और सभी अपने अपने स्तर पर समाजहित में कार्य कर रहे हैं और आगे भी करते ही रहेंगे, लेकिन अब उन सभी संगठनो का एक ही मकसद होना चाहिये......समाज का सभी क्षेत्रो में समग्र विकास....और इसको प्राप्त करने हेतु सभी संगठनो को गुरू वंशजो से समय समय पर राय लेना होगा और अपने अपने कार्य का लेखा जोखा गुरू वंशजो को देना होगा....ताकि गुरू वंशज उचित और प्रभावकारी रणनिती बनाकर शासन प्रशासन तक समाज के बात को रख सके। तो आइये साथियो इस गुरू प्रधान सतनामी समाज को गौरवशाली स्थान तक ले जाने हेतु एकमत होकर कार्य करें और गुरू घासीदास बाबाजी, गुरू अमरदास बाबाजी, एवं राजा गुरू बालकदास जी के सपने को साकार करें तभी हमें सतनामी कहलाने का हक होगा ।
उक्त के संबंध में मुझ निवेदनकर्ता आचार्य हुलेश्वर जोशी का निवेदन है कि हम भविष्य में प्रत्यके वर्ष कृष्ण जन्माष्ठमी के दिन को सतनाम संकल्प दिवस एवं राजागुरू बालकदास जयंति के रूप में मनाते हुए सतनाम धर्म को विश्वकिर्तिमान दिलाने के लिए अपने मन, कर्म और वचन को परमपुज्यनीय गुरू घासीदासजी, राजागुरू बालकदासजी और गुरूवंशजों के गुरूओं के बताये मार्ग और वचन के अनुरूप करें l
लेखक- हुलेश्वर जोशी सतनामी
(श्री विष्णु बन्जारे सतनामीके मार्गदर्शन अनुसार)

गुरूघासीदासजी की शिक्षायें : Shri Vishnu Banjare Satnami

गुरू घासीदास बाबाजी ने समाज में व्याप्त जातिगत विषमताओं को नकारा। उन्होंने ब्राम्हणों के प्रभुत्व को नकारा, और कई वर्णों में बांटने वाली जाति व्यवस्था का विरोध किया। उनका मानना था कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक रूप से समान हैसियत रखता है। गुरू घासीदास ने मूर्तियों की पूजा को वर्जित किया। वे मानते थे कि उच्च वर्ण के लोगों और मूर्ति पूजा में गहरा सम्बन्ध है।
गुरू घासीदास पशुओं से भी प्रेम करने की सीख देते थे। वे उन पर क्रूरता पूर्वक व्यवहार करने के खिलाफ थे। सतनाम पंथ के अनुसार खेती के लिए गायों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिये। गुरू घासीदास के संदेशों का समाज के पिछड़े समुदाय में गहरा असर पड़ा। सन् 1901 की जनगणना के अनुसार उस वक्त लगभग 4 लाख लोग सतनाम पंथ से जुड़ चुके थे और गुरू घासीदास के अनुयायी थे। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह पर भी गुरू घासीदास के सिध्दांतों का गहरा प्रभाव था। गुरू घासीदास के संदेशों और उनकी जीवनी का प्रसार पंथी गीत व नृत्यों के जरिए भी व्यापक रूप से हुआ। यह छत्तीसगढ़ की प्रख्यात लोक विधा भी मानी जाती है।
सत्गुरू घासीदास जी की सात शिक्षाएँ हैं-
(१) सतनाम् पर विश्वास रखना ।
(२) जीव हत्या नही करना ।
(३) मांसाहार नही करना ।
(४) चोरी, जुआ से दुर रहना ।
(५) नशा सेवन नही करना ।
(६) जाति-पाति के प्रपंच में नही पड़ना ।
(७) ब्यभिचार नही करना ।
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1. सत्य एवं अहिंसा
2. धैर्य
3. लगन
4. करूणा
5. कर्म
6. सरलता
7. व्यवहार

लेखक-श्री विष्णु बन्जारे सतनामी

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